रातभर पुरानी अपनी कब्र से
आख़िर हर सुबह जिंदा निकल आता हूँ मैं, बाहर
और न जाने कौन सी आवाज़ मुझे फ़िर खींच लेती है
उस कब्रिस्तान से भी बाहर,
जहाँ की दीवारें 'दर्द ' से चीख उठती हैं, जब उनसे पूछता है कोई
मेरी तन्हाई का आलम।
न जाने किसकी आवाज़ पर
किसकी ज़रूरत के लिए भटकता हूँ मैं दिनभर
जबकि जानता हूँ मेरा मैं ख़ुद भी नही हूँ और
शाम को फ़िर से मर जाऊँगा मैं
लेकिन न जाने कौन सी मृग मरीचिका
जिंदा रखती है मुझे आधी रात के मुहाने तक
और फ़िर छोड़ देती है मेरी हथेलिओं में
मायूसियों की कोरी बिछात
जिनको हर रात भिगोकर मैं चला जाता हूँ
ख़ुद अपनी कब्र मैं, मुझे कुछ पता नही
अभी मेरे हिस्से में कितनी रात की मौतें बाकी है
और मौत से बदतर कितने दिन बकाया हैं।
- दिनेश 'दर्द', उज्जैन
Wednesday, August 13, 2008
Tuesday, August 12, 2008
कहाँ जा रहा है देश
आज़ादी का गाना गाते-गाते हमें ६१ बरस गुज़र गए हैं। हर साल हम बूढी हो चुकी आज़ादी का जश्न पूरे जोश-ओ-खरोश से मानते हैं। पर क्या युवाओं को विरासत में मिली इस आज़ादी की कीमत पता है। सच कहूँ तो नही पता होगी। बूढी जो हो गई है ना हमारी आज़ादी। पर सवाल ये है की हम ६१ बरसों मैं आज़ादी को कितना समझ सके हैं। चक्काजाम, हड़ताल, करफियु, बंद, आरोप, प्रत्यारोप वगेरा-वगेरा शायद इतने बरसों मैं हम आज़ादी का मतलब यही समझ सके हैं। इन सबके बीच कभी-कभी तो यूँ लगता है कि देश को अब फ़िर किसी इन्कलाब या क्रांति की सख्त ज़रूरत है।
- दिनेश दर्द, उज्जैन
- दिनेश दर्द, उज्जैन
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