Wednesday, August 13, 2008

क्यूँ जिंदा है दर्द

रातभर पुरानी अपनी कब्र से
आख़िर हर सुबह जिंदा निकल आता हूँ मैं, बाहर
और न जाने कौन सी आवाज़ मुझे फ़िर खींच लेती है
उस कब्रिस्तान से भी बाहर,
जहाँ की दीवारें 'दर्द ' से चीख उठती हैं, जब उनसे पूछता है कोई
मेरी तन्हाई का आलम।
न जाने किसकी आवाज़ पर
किसकी ज़रूरत के लिए भटकता हूँ मैं दिनभर
जबकि जानता हूँ मेरा मैं ख़ुद भी नही हूँ और
शाम को फ़िर से मर जाऊँगा मैं
लेकिन न जाने कौन सी मृग मरीचिका
जिंदा रखती है मुझे आधी रात के मुहाने तक
और फ़िर छोड़ देती है मेरी हथेलिओं में
मायूसियों की कोरी बिछात
जिनको हर रात भिगोकर मैं चला जाता हूँ
ख़ुद अपनी कब्र मैं, मुझे कुछ पता नही
अभी मेरे हिस्से में कितनी रात की मौतें बाकी है
और मौत से बदतर कितने दिन बकाया हैं।

- दिनेश 'दर्द', उज्जैन

2 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

वाह....दिनेश जी बहुत सुंदर .....!!

अच्छा लगा आपको पढ़कर .....!!

Dr. C S Changeriya said...

kya bat he

tum bhi jabar dat likhte ho


subha kamnaye

shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com