मेरे कुछ अशआर :-
दिल की बात दिल में रखते हैं बस,
अब तो ज़हर-ए-ख़ामुशी पीते हैं बस.
हर बात बयान हो जाएगी बस,
नज़रें मिलाओ और खामोश रहो.
इन ख़ामोश काग़ज़ों पर ये इतराती तहरीरें,
दरअस्ल, मेरे ग़म की कहानी तुम्हारी ज़ुबानी हैं.
उफ्फ ये तबस्सुम और ये महकते गुल,
पशोपेश में हूँ किस पर निसार जाऊं ?
इस ख़ुशी के आलम में, मैं कहूँगा कुछ-तुम समझोगे कुछ,
क्यूँ ना मैं मुस्कुरा के रह जाऊं, तुम समझ के खुश हो जाओ
"दर्द" कुछ बातें फ़क़त इशारों पे छोड़ी जाएँ,
क्या ज़रूरी है हर बात जुबां से बोली जाय.
बुझा रहा हूँ अश्कों से तेरी यादों के शरारे,
ये जानकार भी कि आग से आग नहीं बुझती.
आज फिर खुशनुमा राग दिल पर गिरां गुज़रा,
आज फिर ख़ुशियों ने ग़म की लज़्ज़त छीन ली.
तुम्हारी पशेमानी के बाद वैसे सारा गिला तो गया,
मगर "दर्द" रूठने-मनाने का वो सिलसिला भी तो गया.
करनी पड़ी गुलशन से तुम्हें हिजरत तो क्या,
गुल भी कहन अब गुल रहे तुमसे बिछड़ कर.
मैं सायों से गुज़रता हूँ तो क़दम लड़खड़ाते हैं,
और अक्सर मेरी राहों में साए ही आते हैं.
अपना ही बचपन अपनी ही गोद में उठाये,
कम-अज़-कम बुढ़ापे की देहलीज़ तक तो चलूँ.
dard zinda hai
Thursday, October 8, 2009
Wednesday, August 13, 2008
क्यूँ जिंदा है दर्द
रातभर पुरानी अपनी कब्र से
आख़िर हर सुबह जिंदा निकल आता हूँ मैं, बाहर
और न जाने कौन सी आवाज़ मुझे फ़िर खींच लेती है
उस कब्रिस्तान से भी बाहर,
जहाँ की दीवारें 'दर्द ' से चीख उठती हैं, जब उनसे पूछता है कोई
मेरी तन्हाई का आलम।
न जाने किसकी आवाज़ पर
किसकी ज़रूरत के लिए भटकता हूँ मैं दिनभर
जबकि जानता हूँ मेरा मैं ख़ुद भी नही हूँ और
शाम को फ़िर से मर जाऊँगा मैं
लेकिन न जाने कौन सी मृग मरीचिका
जिंदा रखती है मुझे आधी रात के मुहाने तक
और फ़िर छोड़ देती है मेरी हथेलिओं में
मायूसियों की कोरी बिछात
जिनको हर रात भिगोकर मैं चला जाता हूँ
ख़ुद अपनी कब्र मैं, मुझे कुछ पता नही
अभी मेरे हिस्से में कितनी रात की मौतें बाकी है
और मौत से बदतर कितने दिन बकाया हैं।
- दिनेश 'दर्द', उज्जैन
आख़िर हर सुबह जिंदा निकल आता हूँ मैं, बाहर
और न जाने कौन सी आवाज़ मुझे फ़िर खींच लेती है
उस कब्रिस्तान से भी बाहर,
जहाँ की दीवारें 'दर्द ' से चीख उठती हैं, जब उनसे पूछता है कोई
मेरी तन्हाई का आलम।
न जाने किसकी आवाज़ पर
किसकी ज़रूरत के लिए भटकता हूँ मैं दिनभर
जबकि जानता हूँ मेरा मैं ख़ुद भी नही हूँ और
शाम को फ़िर से मर जाऊँगा मैं
लेकिन न जाने कौन सी मृग मरीचिका
जिंदा रखती है मुझे आधी रात के मुहाने तक
और फ़िर छोड़ देती है मेरी हथेलिओं में
मायूसियों की कोरी बिछात
जिनको हर रात भिगोकर मैं चला जाता हूँ
ख़ुद अपनी कब्र मैं, मुझे कुछ पता नही
अभी मेरे हिस्से में कितनी रात की मौतें बाकी है
और मौत से बदतर कितने दिन बकाया हैं।
- दिनेश 'दर्द', उज्जैन
Tuesday, August 12, 2008
कहाँ जा रहा है देश
आज़ादी का गाना गाते-गाते हमें ६१ बरस गुज़र गए हैं। हर साल हम बूढी हो चुकी आज़ादी का जश्न पूरे जोश-ओ-खरोश से मानते हैं। पर क्या युवाओं को विरासत में मिली इस आज़ादी की कीमत पता है। सच कहूँ तो नही पता होगी। बूढी जो हो गई है ना हमारी आज़ादी। पर सवाल ये है की हम ६१ बरसों मैं आज़ादी को कितना समझ सके हैं। चक्काजाम, हड़ताल, करफियु, बंद, आरोप, प्रत्यारोप वगेरा-वगेरा शायद इतने बरसों मैं हम आज़ादी का मतलब यही समझ सके हैं। इन सबके बीच कभी-कभी तो यूँ लगता है कि देश को अब फ़िर किसी इन्कलाब या क्रांति की सख्त ज़रूरत है।
- दिनेश दर्द, उज्जैन
- दिनेश दर्द, उज्जैन
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