आज़ादी का गाना गाते-गाते हमें ६१ बरस गुज़र गए हैं। हर साल हम बूढी हो चुकी आज़ादी का जश्न पूरे जोश-ओ-खरोश से मानते हैं। पर क्या युवाओं को विरासत में मिली इस आज़ादी की कीमत पता है। सच कहूँ तो नही पता होगी। बूढी जो हो गई है ना हमारी आज़ादी। पर सवाल ये है की हम ६१ बरसों मैं आज़ादी को कितना समझ सके हैं। चक्काजाम, हड़ताल, करफियु, बंद, आरोप, प्रत्यारोप वगेरा-वगेरा शायद इतने बरसों मैं हम आज़ादी का मतलब यही समझ सके हैं। इन सबके बीच कभी-कभी तो यूँ लगता है कि देश को अब फ़िर किसी इन्कलाब या क्रांति की सख्त ज़रूरत है।
- दिनेश दर्द, उज्जैन
1 comment:
वाकई एक क्रांति की ज़रूरत है. आज का युवा 'मोबाइल देवता' के चंगुल में है
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