Thursday, October 8, 2009

मेरे कुछ आज़ाद शेर....

मेरे कुछ अशआर :-

दिल की बात दिल में रखते हैं बस,
अब तो ज़हर-ए-ख़ामुशी पीते हैं बस.


हर बात बयान हो जाएगी बस,
नज़रें मिलाओ और खामोश रहो.

इन ख़ामोश काग़ज़ों पर ये इतराती तहरीरें,
दरअस्ल, मेरे ग़म की कहानी तुम्हारी ज़ुबानी हैं. 

उफ्फ ये तबस्सुम और ये महकते गुल,
पशोपेश में हूँ किस पर निसार जाऊं ?

इस ख़ुशी के आलम में, मैं कहूँगा कुछ-तुम समझोगे कुछ,
क्यूँ ना मैं मुस्कुरा के रह जाऊं, तुम समझ के खुश हो जाओ

"दर्द" कुछ बातें फ़क़त इशारों पे छोड़ी जाएँ,
क्या ज़रूरी है हर बात जुबां से बोली जाय.

बुझा रहा हूँ अश्कों से तेरी यादों के शरारे,
ये जानकार भी कि आग से आग नहीं बुझती.

आज फिर खुशनुमा राग दिल पर गिरां गुज़रा,
आज फिर ख़ुशियों ने ग़म की लज़्ज़त छीन ली.

तुम्हारी पशेमानी के बाद वैसे सारा गिला तो गया,
मगर "दर्द" रूठने-मनाने का वो सिलसिला भी तो गया.

करनी पड़ी गुलशन से तुम्हें हिजरत तो क्या,
गुल भी कहन अब गुल रहे तुमसे बिछड़ कर.

मैं सायों से गुज़रता हूँ तो क़दम लड़खड़ाते हैं,
और अक्सर मेरी राहों में साए ही आते हैं.

अपना ही बचपन अपनी ही गोद में उठाये,
कम-अज़-कम बुढ़ापे की देहलीज़ तक तो चलूँ.

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